उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dhup ki umr ziyaada hai safar mujhse kam

धूप की 'उम्र ज़ियादा है सफ़र मुझ से कम

دھوپ کی عمر زیادہ ہے سفر مجھ سے کم

शायर: Umair Najmi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धूप की 'उम्र ज़ियादा है सफ़र मुझ से कम
इस लिए ज़र्द तो होती है मगर मुझ से कम

मैं हूँ जंगल में उतरता हुआ ज़ेली रस्ता
ख़िल्क़त-ए-शहर का होता है गुज़र मुझ से कम

राएगाँ शख़्स की सोहबत से बुरा कुछ भी नहीं
हिज्र अपनाओ कि इस में है ज़रर मुझ से कम

तू न रह कर भी यहाँ इतना रहा है मिरे यार
तुझ से मानूस ज़ियादा है ये घर मुझ से कम

हर ख़िज़ाँ ऐसे मिरे ज़ख़्म हरे करती है
सब्ज़ लगते हैं बहारों में शजर मुझ से कम

कोई ठेका हो उदासी का मुझे मिलता है
कोई भरता ही नहीं निर्ख़ इधर मुझ से कम

हाथ उठाए मैं जिसे ठीक नज़र आता हूँ
देखना है यहाँ किस की है नज़र मुझ से कम

क्या कहा तू ने फुलाँ मुझ से भी कम बोलता है
मैं नहीं मानता सच यार न कर मुझ से कम

वो फ़क़त रोता है हँसता नहीं ता-देर 'उमैर'
मेरे बेटे में है वहशत का असर मुझ से कम