उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dar-o-diwar par sabza nahin hai

दर-ओ-दीवार पर सब्ज़ा नहीं है

در و دیوار پر سبزہ نہیں ہے

शायर: Balwan Singh Azar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर-ओ-दीवार पर सब्ज़ा नहीं है
वगरना और घर में क्या नहीं है

वफ़ा वाले कहाँ ग़ोता लगाएँ
त'अल्लुक़ कोई भी गहरा नहीं है

वो जिस मौसम में होता था नुमू मैं
किसी भी सम्त से लौटा नहीं है

'अजब गुम-गश्तगी में जी रहा हूँ
बदन तो है मगर चेहरा नहीं है

बहुत ही काम की है राएगानी
किसी ने ठीक से बरता नहीं है