उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chahta hun ki nazar nur se manus na ho

चाहता हूँ कि नज़र नूर से मानूस न हो

چاہتا ہوں کہ نظر نور سے مانوس نہ ہو

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाहता हूँ कि नज़र नूर से मानूस न हो
रौशनी हो मगर इतनी हो कि महसूस न हो

कैसे खुल पाए ये रा'शा है कि भूँचाल अगर
कमरे की छत से लटकता हुआ फ़ानूस न हो

ज़िंदगी लम्बी तो हो सकती है बे-अंत नहीं
ख़ुदकुशी की भी सुहूलत है तू मायूस न हो

तू दु'आ कर कि मैं रोता रहूँ सहरा न बनूँ
ख़ाक और नम का तनासुब कभी मा'कूस न हो

जिस्म का अम्न सबोटाझ किए रखती है
रूह दर-अस्ल समावात की जासूस न हो

कोई आसेब भी छेड़े न मिरी तन्हाई
ऐसा घर देख जो ख़ाली तो हो मनहूस न हो

अब ये ज़र्दी भी भुगतना तो पड़ेगी कुछ दिन
मैं न कहता था हरे रंग में मल्बूस न हो