उर्दू शायरी · ग़ज़ल

butan-e-mah-wash ujDi hui manzil mein rahte hain

बुतान-ए-माह-वश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं

بتان ماہ وش اجڑی ہوئی منزل میں رہتے ہیں

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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बुतान-ए-माह-वश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
कि जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं

ज़मीं पर पाँव नफ़रत से नहीं रखते परी-पैकर
ये गोया इस मकाँ की दूसरी मंज़िल में रहते हैं

मुहीत-ए-इश्क़ की हर मौज तूफ़ाँ-ख़ेज़ ऐसी है
वो हैं गिर्दाब में जो दामन-ए-साहिल में रहते हैं

ख़ुदा रक्खे मोहब्बत ने किए आबाद दोनों घर
मैं उन के दिल में रहता हूँ वो मेरे दिल में रहते हैं

जो होती ख़ूब-सूरत तो न छुपती क़ैस से लैला
मगर ऐसे ही वैसे पर्दा-ए-महमिल में रहते हैं

हमारे साए से बचता है हर इक बज़्म में उस की
हमें देखो कि हम तन्हा भरी महफ़िल में रहते हैं

कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस 'दाग़' है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं