उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aashiq ke dil mein aur teri aarzu na ho

आशिक़ के दिल में और तिरी आरज़ू न हो

عاشق کے دل میں اور تری آرزو نہ ہو

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आशिक़ के दिल में और तिरी आरज़ू न हो
इस बाग़ का तू फूल हो फिर इस में बू न हो

ऐ दर्द-ए-इश्क़ ख़ाना-ए-दिल घर तिरा सही
आबाद ये मकान तो जब हो कि तू न हो

मैं रंग देख कर न करूँगा यक़ीं कभी
जब तक अदू के ख़ून की ख़ंजर में बू न हो

चाक-ए-दिल-ए-रक़ीब की जब फ़िक्र कीजिए
पहले ये देख लीजिए पहला रफ़ू न हो

इस फ़िक्र में कुछ उन से न हम बात कर सके
ये गुफ़्तुगू न हो कहीं वो गुफ़्तुगू न हो

मुझ को जनाब-ए-शैख़ की दावत ज़रूर है
ऐसी कहीं शराब मिले जिस में बू न हो

मिट्टी की मूरत इस से तो ऐ 'दाग़' ख़ूब है
मा'शूक़ क्या जो शोख़ न हो ख़ुश-गुलू न हो