उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aalam-e-yas mein ghabrae na insan bahut

आलम-ए-यास में घबराए न इंसान बहुत

عالم یاس میں گھبرائے نہ انسان بہت

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आलम-ए-यास में घबराए न इंसान बहुत
दिल सलामत है तो हसरत बहुत अरमान बहुत

काश दो चार हज़ारों में तो हों काफ़िर-ए-इश्क़
हम ने का'बे में भी देखे न मुसलमान बहुत

सर उठाता नहीं तू शर्म-ए-जफ़ा से ज़ालिम
या किए हैं किसी कम-बख़्त ने एहसान बहुत

तुम कि बेदाद करो और न शरमाओ ज़रा
हम कि ना-कर्दा-गुनह और पशेमान बहुत

हसरतें रोज़ नई दिल में भरी जाती हैं
थोड़े थोड़े भी हुए जाते हैं मेहमान बहुत

सोचिए दिल में तो है इश्क़ निहायत दुश्वार
न समझिए तो यही काम है आसान बहुत

बज़्म-ए-अहबाब में ऐ 'दाग़' कभी तो हँस बोल
देखते हैं तुझे हर वक़्त परेशान बहुत