उर्दू शायरी · ग़ज़ल

but-kada nazdik kaba dur tha

बुत-कदा नज़दीक काबा दूर था

بت کدہ نزدیک کعبہ دور تھا

शायर: Hafeez Jaunpuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बुत-कदा नज़दीक काबा दूर था
मैं इधर ही रह गया मजबूर था

शाम ही से हम कहीं जाते थे रोज़
मुद्दतों अपना यही दस्तूर था

वो किया जिस में ख़ुशी थी आप की
वो हुआ जो आप को मंज़ूर था

कुछ अदब से रह गए नाले इधर
क्या बताएँ अर्श कितनी दूर था

जिस घड़ी था उस के जल्वे का ज़ुहूर
अर्श का हम-संग कोह-ए-तूर था

इक हसीं का आ गया जो तज़्किरा
देर तक महफ़िल में ज़िक्र-ए-हूर था

वस्ल की शब थी शब-ए-मेराज क्या
दूर तक फैला हुआ इक नूर था

हर कस-ओ-ना-कस से क्या मिलती निगाह
अपनी आँखों में बुत-ए-मग़रूर था

उम्र भर फ़िक्र-ए-सुख़न में था 'हफ़ीज़'
शाएरी का दिल में इक नासूर था