उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bas utna hi paDha maine ki jo nisab mein tha

बस उतना ही पढ़ा मैं ने कि जो निसाब में था

بس اتنا ہی پڑھا میں نے کہ جو نصاب میں تھا

शायर: Vikas Sharma Raaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बस उतना ही पढ़ा मैं ने कि जो निसाब में था
उसे छुआ भी नहीं जो मिरी किताब में था

वही तो दिन थे उजालों के फूल चुनने के
उन्हीं दिनों मैं अँधेरों के इंतिख़ाब में था

मिरे 'उरूज की लिक्खी थी दास्ताँ जिस में
मिरे ज़वाल का क़िस्सा भी उस किताब में था

बला का हब्स था और नींद टूटती ही न थी
न कोई दर न दरीचा फ़सील-ए-ख़्वाब में था

हवा से वस्ल हुआ और हो गया आज़ाद
वो हफ़्त-रंग उजाला जो मुझ हबाब में था