उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dar-e-imkan khula hai mujh mein

दर-ए-इम्कान खुला है मुझ में

در امکان کھلا ہے مجھ میں

शायर: Balwan Singh Azar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर-ए-इम्कान खुला है मुझ में
पाँव ख़ुशबू का पड़ा है मुझ में

ख़त्म होता ही नहीं मेरा सफ़र
कोई थक-हार गया है मुझ में

फूल ही फूल नज़र आते हैं
शौक़ ज़ंजीर हुआ है मुझ में

अपनी हर साँस गराँ है मुझ को
जब से बाज़ार लगा है मुझ में

रोज़-ए-अव्वल से अंधेरे में हूँ
चाँद क्यों चीख़ रहा है मुझ में

अपने अंदर मैं समेटूँ क्या क्या
सारा घर बिखरा पड़ा है मुझ में

इक नई जंग लड़ा हूँ ख़ुद से
देर तक ख़ून बहा है मुझ में