उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apni samjhe the magar nikli parai zindagi

अपनी समझे थे मगर निकली पराई ज़िंदगी

اپنی سمجھے تھے مگر نکلی پرائی زندگی

शायर: Chandrakant Rawat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपनी समझे थे मगर निकली पराई ज़िंदगी
जाने किस मिट्टी की थी क़ाबू न आई ज़िंदगी

तय-शुदा था लड़खड़ाना और गिरना एक दिन
था कुआँ आगे कभी पीछे थी खाई ज़िंदगी

यूँ ही तो छोड़ा न हम ने बीच रस्ते में तुझे
जब तलक हम से निभी हम ने निभाई ज़िंदगी

हम से सब अच्छा बुरा क्या क्या न करवाती रही
ले भुगत अब शौक़ से ये जग-हँसाई ज़िंदगी

धीरे धीरे ख़ुद से अपना फ़ासला बढ़ता गया
लम्हा लम्हा वक़्त ने हम से चुराई ज़िंदगी

ज़िंदगी को इस तरह कुछ हम ने ज़ाए' कर दिया
जैसे कि ख़ैरात में थी हम ने पाई ज़िंदगी