नात लिरिक्स

Yaad Jab Mujh Ko Madine Ka Faza Aati Hai

याद जब मुझ को मदीने की फ़ज़ा आती है

नात ख़्वान: सय्यिद ज़बीब मसूदशायर: अमीर मीनाईउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

याद जब मुझ को मदीने की फ़ज़ा आती हैसाँस लेता हूँ तो जन्नत की हवा आती है

ख़ाक छानें तो रह-ए-'इश्क़-ए-नबी में छानेंज़र्रे ज़र्रे से जहाँ बू-ए-वफ़ा आती है

ग़म-ए-अहमद में मेरे दिल से निकलता है धुँवाया उमँडती हुई का'बे से घटा आती है

रौज़ा-ए-पाक पे सब ज़ब्त-ए-नफ़स करते हैंइस गुलिस्ताँ में दबे पाँव सबा आती है

फ़र्श पर होता है जब ज़िक्र-ए-रसूल-ए-अकरम'अर्श-ए-हक़ से भी दुरूदों की सदा आती है

हूँ ग़ुलामान-ए-मुहम्मद के ग़ुलामों का ग़ुलामख़ाक हूँ, ख़ाक को बिछने की अदा आती है

दावर-ए-हश्र ने ये कह के मुझे बख़्श दियाख़ूब तुझ को मेरे प्यारे की सना आती है

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