नात लिरिक्स

Sunehri Jaliyan Gumbad Suhana Yaad Aata Hai | Mujhe Reh Reh Ke Aaqa Ka Madina Yaad Aata Hai

सुनहरी जालियाँ गुंबद सुहाना याद आता है | मुझे रह रह के आक़ा का मदीना याद आता है

नात ख़्वान: अहमदुल फ़त्ताहशायर: अहमदुल फ़त्ताहउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

सुनहरी जालियाँ, गुंबद सुहाना याद आता हैमुझे रह रह के आक़ा का मदीना याद आता है

छमा-छम नूर की बरसात थी और सामने ख़ज़रारसूल-ए-पाक को ना'तें सुनाना याद आता है

हुदूद-ए-मस्जिद-ए-नबवी में चलना, बैठना, उठनाकबूतर को वहाँ दाना खिलाना याद आता है

वो छतरी ऐसे खुलती है कि जैसे पर फ़रिश्तों केफिर उस के साए में इफ़्तार करना याद आता है

वो जिस ख़ुश्बू से आक़ा को सहाबा ढूँड लेते थेवो ख़ुश्बू याद आती है, पसीना याद आता है

तवाफ़-ए-क़ब्र-ए-हम्ज़ा कर के कहती है हवा अब भीतुम्हारा बद्र के मैदाँ में आना याद आता है

बक़ी'-ए-पाक से जब गुंबद-ए-ख़ज़रा नज़र आताकलाम-ए-आ'ला-हज़रत गुनगुनाना याद आता है

बक़ी'-ए-पाक का मंज़र, सहाबा की हसीं क़ब्रेंवहाँ से गुंबद-ए-ख़ज़रा को तकना याद आता है

उठे ऊँगली क़मर टुकड़े हो, सूरज भी पलट आएपहाड़ों को इशारे से बुलाना याद आता है

ये अहमद था नहीं लाइक़ कि जाता ये मदीने मेंमगर सरकार का फिर भी बुलाना याद आता है

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