नात लिरिक्स

Soz-e-Dil Chahiye Chashm-e-Nam Chahiye Aur Shauq-e-Talab Motabar Chahiye

सोज़-ए-दिल चाहिए चश्म-ए-नम चाहिए और शौक़-ए-तलब मोतबर चाहिए

नात ख़्वान: महमूद-उल-हसन अशरफ़ीशायर: इक़बाल अज़ीमउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

सोज़-ए-दिल चाहिए, चश्म-ए-नम चाहिए और शौक़-ए-तलब मो'तबर चाहिएहों मुयस्सर मदीने की गलियाँ अगर, आँख काफ़ी नहीं है नज़र चाहिए

उन की महफ़िल के आदाब कुछ और हैं, लब-कुशाई की जुरअत मुनासिब नहींउन की सरकार में इल्तिजा के लिए, जुंबिश-ए-लब नहीं, चश्म-ए-तर चाहिए

अपनी रूदाद-ए-ग़म मैं सुनाऊँ किसे ? मेरे दुख को कोई और समझेगा क्याजिस की ख़ाक-ए-क़दम भी है ख़ाक-ए-शिफ़ा, मेरे ज़ख़्मों को वो चारा-गर चाहिए

रौनक़ें ज़िंदगी की बहुत देख लीं, अब मैं आँखों का अपनी करूँगा भी क्याअब न कुछ दीदनी है न कुछ गुफ़्तनी, मुझ को आक़ा की बस इक नज़र चाहिए

मैं गदा-ए-दर-ए-शाह-ए-कौनैन हूँ, शीश-महलों की मुझ को तमन्ना नहींहो मुयस्सर ज़मीं पर कि ज़ेर-ए-ज़मीं मुझ को तयबा में इक अपना घर चाहिए

इन नए रास्तों की नई रौशनी, हम को रास आई है और न रास आएगीहम को खोई हुई रौशनी चाहिए, हम को आईन-ए-ख़ैर-उल-बशर चाहिए

गोशा गोशा मदीने का पुर-नूर है, सारा माहौल जल्वों से मा'मूर हैशर्त ये है कि ज़र्फ़-ए-नज़र चाहिए, देखने को कोई दीदा-वर चाहिए

मिदहत-ए-शाह-ए-कौन-ओ-मकाँ के लिए, सिर्फ़ लफ़्ज़-ओ-बयाँ का सहारा न लोफ़न्न-ए-शे'री है, इक़बाल ! अपनी जगह, ना'त कहने को ख़ून-ए-जिगर चाहिए

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