नात लिरिक्स

Ab To Bas Ek Hi Dhun Hai Ke Madina Dekhun

अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीशायर: इक़बाल अज़ीमउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँअब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ

आख़री 'उम्र में क्या रौनक़-ए-दुनिया देखूँअब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ

आख़री वक़्त में क्या रौनक़-ए-दुनिया देखूँअब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ

अज़-उफ़क़ ता-ब-उफ़क़ एक ही जल्वा देखूँजिस तरफ़ आँख उठे रौज़ा-ए-वाला देखूँ

'आक़िबत मेरी सँवर जाए जो तयबा देखूँदस्त-ए-इमरोज़ में आईना-ए-फ़र्दा देखूँ

मैं कहाँ हूँ, ये समझ लूँ तो उठाऊँ नज़रेंदिल सँभल जाए तो मैं जानिब-ए-ख़ज़रा देखूँ

मैं कहाँ हूँ, ये समझ लूँ तो उठाऊँ नज़रेंदिल जो सँभले तो मैं फिर गुंबद-ए-ख़ज़रा देखूँ

मैं ने जिन आँखों से देखा है कभी शहर-ए-नबीऔर इन आँखों से अब क्या कोई जल्वा देखूँ

बा'द-ए-रेहलत भी जो सरकार को महबूब रहाअब इन आँखों से मैं ख़ुश-बख़्त वो हुजरा देखूँ

जालियाँ देखूँ कि दीवार-ओ-दर-ओ-बाम-ए-हरमअपनी मा'ज़ूर निगाहों से मैं क्या-क्या देखूँ

मेरे मौला ! मेरी आँखें मुझे वापस कर देता-कि इस बार मैं जी भर के मदीना देखूँ

जिन गली कूचों से गुज़रे हैं कभी मेरे हुज़ूरउन में ता-हद्द-ए-नज़र नक़्श-ए-कफ़-ए-पा देखूँ

ता-कि आँखों का भी एहसान उठाना न पड़ेक़ल्ब ख़ुद आईना बन जाए, मैं इतना देखूँ

काश, इक़बाल ! यूँही 'उम्र बसर हो मेरीसुब्ह का'बे में हो और शाम को तयबा देखूँ

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