नात लिरिक्स

Jahan Rauza-e-Pak-e-Khair-ul-wara Hai Wo Jannat Nahin Hai To Phir Aur Kya Hai

जहाँ रौज़ा-ए-पाक-ए-ख़ैर-उल-वरा है वो जन्नत नहीं है तो फिर और क्या है

नात ख़्वान: क़ारी वहीद ज़फ़र क़ासमीशायर: इक़बाल अज़ीमउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

जहाँ रौज़ा-ए-पाक-ए-ख़ैर-उल-वरा है वो जन्नत नहीं है तो फिर और क्या हैकहाँ मैं कहाँ ये मदीने की गलियाँ, ये क़िस्मत नहीं है तो फिर और क्या है

मुहम्मद की 'अज़मत को क्या पूछते हो कि वो साहिब-ए-क़ाब-क़ौसैन ठहरेबशर की सर-ए-'अर्श मेहमाँ-नवाज़ी ये 'अज़मत नहीं है तो फिर और क्या है

जो 'आसी को दामन में अपने छुपा ले, जो दुश्मन को भी ज़ख़्म खा कर दु'आ देउसे और क्या नाम देगा ज़माना, वो रहमत नहीं है तो फिर और क्या है

शफ़ा'अत क़यामत की ताबे' नहीं है, ये चश्मा तो रोज़-ए-अज़ल से है जारीख़ता-कार बंदों पे लुत्फ़-ए-मुसलसल शफ़ा'अत नहीं है तो फिर और क्या है

क़यामत का इक दिन मुअ'य्यन है लेकिन हमारे लिए हर-नफ़स है क़यामतमदीने से हम जाँ-निसारों की दूरी क़यामत नहीं है तो फिर और क्या है

तुम, इक़बाल ! ये ना'त कह तो रहे हो मगर ये भी सोचा कि क्या कर रहे होकहाँ तुम कहाँ मद्ह-ए-ममदूह-ए-यज़्दाँ, ये जुरअत नहीं है तो फिर और क्या है

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