नात लिरिक्स

Madina Pahuncha Hai Jab Diwana Kabhi Idhar Se Kabhi Udhar Se

मदीना पहुँचा है जब दिवाना कभी इधर से कभी उधर से

नात ख़्वान: सैफ़ रज़ा कानपुरीशायर: सैफ़ रज़ा कानपुरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मदीना पहुँचा है जब दिवाना कभी इधर से कभी उधर सेनबी की चौखट को उस ने चूमा कभी इधर से कभी उधर से

ब-रोज़-ए-महशर परेशाँ हो कर उन्हें पुकारेगी जिस दम उम्मतसभी को देंगे नबी सहारा कभी इधर से कभी उधर से

तमाशा इतना तो कर गुज़रना, नबी का दीवाना हो के मरनाकि लोग देखें तेरा जनाज़ा कभी इधर से कभी उधर से

कभी तो ग़ौस-उल-वरा के दर से, कभी तो ख़्वाजा पिया के घर सेनिकल ही जाता है काम अपना कभी इधर से कभी उधर से

इधर बरेली उधर किछौछा, वहाँ पे कलियर यहाँ पे देवामिला है वलियों का हम को सदक़ा कभी इधर से कभी उधर से

क़सीदा बू-बक्र का पढ़ा था, 'उमर की ता'रीफ़ कर रहा था'अली ने मुझ को बहुत नवाज़ा कभी इधर से कभी उधर से

बचाने दीन-ए-नबी की 'अज़मत जो रन में निकला 'अली का बेटायज़ीदी कुत्तों को जम के मारा कभी इधर से कभी उधर से

बचाने दीन-ए-नबी की 'अज़मत जो रन में निकला रज़ा का अख़्तरवहाबियों को पटक के मारा कभी इधर से कभी उधर से

मेरी ज़बाँ पर जो नाम-ए-नामी इमाम अहमद रज़ा का आयालगा है महफ़िल में ख़ूब ना'रा कभी इधर से कभी उधर से

ख़ुदा ने हुस्न-ओ-जमाल वल्लाह रज़ा के अख़्तर को ऐसा बख़्शादिवानें तकते हैं उन का चेहरा कभी इधर से कभी उधर से

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