नात लिरिक्स

Ab Hosh Kahaan Baaqi, Main Tha Kabhi Farzaana | Tazmeen of Be-Khud Kiye Dete Hain Andaaz-e-Hijaabaana

अब होश कहाँ बाक़ी, मैं था कभी फ़रज़ाना | तज़मीन - बे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबाना

नात ख़्वान: सैफ़ रज़ा कानपुरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

अब होश कहाँ बाक़ी, मैं था कभी फ़रज़ानाथा दिल में कभी का'बा, अब है ये दर-ए-जानाहै नर्गिसी-आँखों में वो रंग-ए-तिलिस्मानाबे-ख़ुद किए देते हैं अंदाज़-ए-हिजाबानाआ दिल में तुझे रख लूँ, ए जल्वा-ए-जानाना !

बीमार-ए-वफ़ा पर हो इक नज़र-ए-मुहिब्बानाजो है अभी ग़म-ख़ाना, बन जाए शिफ़ा-ख़ानाहो मुझ पे दम-ए-आख़िर, अंदाज़-ए-मसीहानाइतना तो करम करना, ए नर्गिस-ए-मस्ताना !जब जान लबों पर हो, तुम सामने आ जाना

ज़ख़्मों को हवा दे कर ये दर्द बढ़ाया हैआँखों से मोहब्बत का क्या जाम पिलाया हैतुमने ही मोहब्बत का एहसास दिलाया हैदुनिया में मुझे तुम ने जब अपना बनाया हैमहशर में भी कह देना, ये है मेरा दीवाना

क्यूँ रह के पस-ए-पर्दा आवाज़ सुनाई थीख़्वाबीदा सी आँखों की क्यूँ नींद उड़ाई थीमैं कैसे कहूँ, जाना ! जो आग लगाई थीक्यूँ आँख मिलाई थी, क्यूँ आग लगाई थीअब रुख़ को छुपा बैठे कर के मुझे दीवाना

नज़रों से जो बटती है, क्या तुम ने कभी पी है ?मुझ को जो पिलाओगे, बतलाओ कहाँ की है ?सुन लो, ए जहाँ वालो ! 'आशिक़ ने सदा दी हैपीने को तो पी लूँगा, बस शर्त ज़रा सी हैअजमेर का साक़ी हो, बग़दाद का मय-ख़ाना

जो दहर में जल्वे हैं, जल्वे हैं इसी दर केझोली में मेरी, बेशक ! टुकड़े हैं इसी दर केदुनिया-ए-मोहब्बत में किस्से हैं इसी दर केबेदम ! तेरी क़िस्मत में चक्कर हैं इसी दर केछूटा है न छूटेगा संग-ए-दर-ए-जानाना

कलाम:बेदम शाह वारसी

तज़मीन:सैफ़ रज़ा कानपुरी

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