नात लिरिक्स

Ishq Ke Rang Mein Rang Jaao Mere Yaar

इश्क़ के रंग में रंग में रंग जाओ मेरे यार

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीशायर: अदीब रायपुरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

'इश्क़ के रंग में रंग जाएँ जब अफ़्कार, तो खुलते हैं ग़ुलामों पे वो असरार कि रहते हैं वो तौसीफ़-ओ-सना-ए-शह-ए-अबरार में हर लहज़ा गौहर-बारवर्ना वो सय्यिद-ए-'आली-नसबी, हाँ ! वही उम्मी-लक़बी, हाशमी-ओ-मुत्तलबी-ओ-'अरबी-ओ-क़रशी-ओ-मदनी और कहाँ हम से गुनहगार

आरज़ू ये है कि हो क़ल्ब मु'अत्तर-ओ-मुतह्हर-ओ-मुनव्वर-ओ-मुसफ़्फ़ा-ओ-मुजल्ला दुर्र-ए-आ'ला जो नज़र आए कहीं जल्वा-ए-रू-ए-शह-ए-अबरारजिन के क़दमों की चमक चाँद सितारों में नज़र आए, जिधर से वो गुज़र जाए, वही राह चमक जाए, दमक जाए, महक जाए, बने रौनक़-ए-गुलज़ार

सूँघ लूँ ख़ुश्बू-ए-गेसू-ए-मुहम्मद, वो सियह ज़ुल्फ़, नहीं जिस के मुक़ाबिल ये बनफ़्शा, ये सुयूती, ये चम्बेली, ये गुल-ए-लाला-ओ-चंपा का निखारजिस की नकहत पे हैं क़ुर्बान गुल-ओ-बर्ग-ओ-समन, नाफ़-ए-आहू-ए-ख़ुतन, बाद-ए-चमन, बू-ए-चमन, नाज़-ए-चमन, नूर-ए-चमन, रंग-ए-चमन, सारा चमन ज़ार

इक शहंशाह ने बख़्शे जो समरक़ंद-ओ-बुख़ारा किसी महबूब के रुख़्सार के तिल पर मगर, ए सय्यिद-ए-'आली ! तेरी नामूस, तेरी अज़मत परए रसूल-ए-मदनी ! एक नहीं लाखों हैं क़ुर्बान गह-ए-'इश्क़ के हर कूचा-ओ-बाज़ार में सर अपना हथेली पे लिए फिरते हैं करने को निसार

आप के ज़िक्र में हैं नग़्मा-सरा सार-ए-हुदी, ख़्वान-ए-'अरब, नग़्मा-निगारान-ए-'अजम, शौक़त-ए-अल्फ़ाज़-ओ-अदब, 'अज़मत-ए-क़िर्तास-ओ-क़लम, बाद-ए-सबा मौज-ए-नसीमदहन-ए-बुलबुल-ए-शीरीं, लहन-ए-क़ुमरी-ओ-तूती, शब-ए-महताब, सितारे, मलक-ओ-हूर-ओ-जिनाँ जिन की नवाओं में दुरूदों का हिसार

व-रफ़'अना लका ज़िक्रक की इसी आया-ए-तौसीफ़ की तौसीफ़ में, तफ़्सीर में, तशरीह में, तौज़ीह में, तज़मीन में हर 'अहद की शामिल है ज़बानलब-ए-हस्सान-ओ-रवाह, हाँ ! वो लब-ए-फ़ातिमा-ज़हरा-ओ-'अली, 'आबिद-ए-बीमार-ओ-बुसीरी, दहन-ए-'उर्फ़ी-ओ-जामी, लब-ए-सा'दी-ओ-रज़ा सब सरशार

'इश्क़ के रंग में रंग जाएँ मुहाजिर हो कि पख़्तून-ओ-बलोची हो कि पंजाबी-ओ-सिंधी किसी ख़ित्ते की, क़बीले की ज़बाँ इस से नहीं कोई सरोकारजामा-ए-'इश्क़-ए-मुहम्मद जो पहन लेता है, हर ख़ार को वो फूल बना लेता है, दुनिया को झुका लेता है, करता है ज़माने को मोहब्बत का शिकार

ये मुहाजिर की है सफ़ और ये पंजाबी की, पख़्तून की, सिंधी की, बलोची की जुदा पढ़ के दिखाओ तो किसी शहर की मस्जिद में कभी ऐसी नमाज़हरम-ए-का'बा में, 'अरफ़ात के मैदान में या रौज़ा-ए-सरकार पे क्यूँ शाने मिलाते हो, वहाँ करते नहीं रंग का और नस्ल का तुम अपनी शुमार

ए अदीब ! अब यूँही अल्फ़ाज़ के अंबार में हम डूबते रह जाएँ मगर हक़्क़-ए-सना-गोई अदा फिर भी न कर पाएँ, ये जज़्बात-ओ-ज़बान-ओ-क़लम-ओ-फ़िक्र-ओ-ख़यालउन की मिदहत तो मलाइक का वज़ीफ़ा है, सहाबा का तरीक़ा है, 'इबादत का सलीक़ा है, ये ख़ालिक़ का पसंदीदा है, क़ुरआन का है इस में शि'आर

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