उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi se ho mafar mumkin nahin

ज़िंदगी से हो मफ़र मुमकिन नहीं

زندگی سے ہو مفر ممکن نہیں

शायर: Tahira Jabeen7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी से हो मफ़र मुमकिन नहीं
लाख चाहो तुम मगर मुमकिन नहीं

दूसरों के वास्ते साया तो है
ज़ेर-ए-साया हो शजर मुमकिन नहीं

ज़िंदगी में ऐसे वो शामिल हुआ
उस के बिन अब ये सफ़र मुमकिन नहीं

आगही हो और सुकून-ए-क़ल्ब से
उम्र हो जाए बसर मुमकिन नहीं

इश्क़ से दामन बचा कर ही चलो
जान से जाना अगर मुमकिन नहीं

राह-ए-हक़ में लाख पत्थर आएँगे
साफ़ हो उस की डगर मुमकिन नहीं

'ताहिरा' उस संग-दिल को छोड़ दे
ज़िंदगी में सब्र गर मुमकिन नहीं