उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne hisse ki zamin bhi chahiye

अपने हिस्से की ज़मीं भी चाहिए

اپنے حصے کی زمیں بھی چاہیے

शायर: Tahira Jabeen7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने हिस्से की ज़मीं भी चाहिए
दिल मकाँ को इक मकीं भी चाहिए

लड़के वालों की तलब तो देखिए
लड़की अफ़सर भी हसीं भी चाहिए

उस की बातें याद करते हैं चलो
शाम-ए-ग़म कुछ दिल-नशीं भी चाहिए

उस की हर दम हाँ घमंडी कर गई
उस के मुँह से इक नहीं भी चाहिए

दम किराए के मकानों में घुटे
घर हो कैसा भी कहीं भी चाहिए

हम न हों तो तुम भी बे-मा'नी रहो
आस्ताने को जबीं भी चाहिए

शे'र तो कुछ 'ताहिरा' ने कह दिए
लेकिन उस को आफ़रीं भी चाहिए