उर्दू शायरी · ग़ज़ल

naghma-e-zist gungunae kaun

नग़्मा-ए-ज़ीस्त गुनगुनाए कौन

نغمۂ زیست گنگنائے کون

शायर: Tahira Jabeen11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नग़्मा-ए-ज़ीस्त गुनगुनाए कौन
आगही का 'अज़ाब उठाए कौन

दोनों राज़ी तो हैं सुल्ह के लिए
पर अना है कि पहले आए कौन

लाख दुश्मन ने मारना चाहा
जिस को रक्खे ख़ुदा मिटाए कौन

जी में आता है उस से बात करें
बात अपनी मगर बनाए कौन

उस ने वा'दे तो बे-शुमार किए
अपने वा'दे मगर निभाए कौन

दिल की बस्ती में कोई क्या आए
ये जो उजड़े तो फिर बसाए कौन

आँख में किर्चियाँ हैं पहले ही
ख़्वाब अब के नए सजाए कौन

जो किसी की दु'आ में शामिल हो
हाथ उस के लिए उठाए कौन

जब त'अल्लुक़ ही तर्क कर बैठे
कौन रूठा करे मनाए कौन

जो हुए हैं जुदा इरादे से
ऐसे बिछड़ों को फिर मिलाए कौन

'ताहिरा' अन-कही ही रहने दो
दिल की बातें तुम्हारी पाए कौन