उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo bhi haq par ho wahi dar-o-rasan tak pahunche

जो भी हक़ पर हो वही दार-ओ-रसन तक पहुँचे

جو بھی حق پر ہو وہی دار و رسن تک پہنچے

शायर: Tahira Jabeen5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो भी हक़ पर हो वही दार-ओ-रसन तक पहुँचे
आदमी आज का यूँ रस्म-ए-कोहन तक पहुँचे

बात हो गुल की जहाँ उस के लबों तक आए
ज़िक्र जब सर्व का हो उस के बदन तक पहुँचे

मैं ने ठानी है हिफ़ाज़त मैं करूँगी उस की
हो जो हिम्मत तो ख़िज़ाँ मेरे चमन तक पहुँचे

ये बदन ढाल बना लूँगी हवा के आगे
गर्म झोंका जो कोई मेरे वतन तक पहुँचे

और भी होंगे यहाँ लाख सुख़न-वर लेकिन
कोई तो हो जो मिरी तर्ज़-ए-सुख़न तक पहुँचे