उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi asar na mere harf-e-muddaa mein raha

कभी असर न मिरे हर्फ़-ए-मुद्दआ' में रहा

کبھی اثر نہ مرے حرف مدعا میں رہا

शायर: Tahira Jabeen7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी असर न मिरे हर्फ़-ए-मुद्दआ' में रहा
न इख़्तियार कोई दस्त-ए-ना-रसा में रहा

नसीब-ए-दुख़्तर-ए-हव्वा जफ़ा-ओ-जौर-ओ-सितम
शुमार हुस्न-ओ-नज़ाकत में और वफ़ा में रहा

अमीर-ए-शहर कि था ज़ो'म-ए-इक़्तिदार में गुम
ग़रीब-ए-शहर सदा जब्र-ए-नारवा में रहा

उतर गया रग-ओ-पै में वो ज़हर की मानिंद
मिसाल-ए-शहद जो इक शख़्स इब्तिदा में रहा

मैं हो सकी न कभी अपनी ज़ात तक महदूद
हर एक फूल चमन का मिरी दुआ में रहा

मैं वो मरीज़ हूँ जिस के लिए न कोई असर
किसी के हर्फ़-ए-तसल्ली में और दुआ में रहा

वो मुझ को देख के करता रहा है अन-देखा
अजीब तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल भी ए'तिना में रहा