उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi ko ek musalsal imtihan kahte rahe

ज़िंदगी को इक मुसलसल इम्तिहाँ कहते रहे

زندگی کو اک مسلسل امتحاں کہتے رہے

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी को इक मुसलसल इम्तिहाँ कहते रहे
लग़्ज़िश-ए-पा को ही मंज़िल का निशाँ कहते रहे

मस्लहत थी या कि थी वो इश्क़ की मजबूरियाँ
उस बुत-ए-नामेहरबाँ को मेहरबाँ कहते रहे

चुपके चुपके कह गई जो दास्ताँ को दास्ताँ
उस निगाह-ए-शौक़ को हम बे-ज़बाँ कहते रहे

इक तबस्सुम इक निगह और एक क़तरा अश्क का
बस इन्हीं पर कहने वाले दास्ताँ कहते रहे

ज़र्द पत्ते ख़ुश्क कलियाँ फूल मुरझाए हुए
ये हैं अक्स-ए-क़ल्ब-ए-वीराँ हम ख़िज़ाँ कहते रहे

अपने ही ज़ौक़-ए-नज़र ने बख़्शी उन को दिलबरी
वर्ना क्या है जिस को हम हुस्न-ए-बुताँ कहते रहे

गोशा-ए-दिल में वो मेरे सब सिमट कर रह गया
ग़म का इक तूफ़ाँ जिसे अहल-ए-जहाँ कहते रहे

जल्वा-गर रग रग में है और दीदा-ओ-दिल में निहाँ
हम जिसे ख़ल्वत-नशीन-ए-ला-मकाँ कहते रहे

प्यार के लम्हे जो उन की बज़्म में गुज़रे 'हबीब'
हम हयात-ए-ख़िज़्र पर उन को गराँ कहते रहे