उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi ko ek rangin dastan samjha tha main

ज़िंदगी को एक रंगीं दास्ताँ समझा था मैं

زندگی کو ایک رنگیں داستاں سمجھا تھا میں

शायर: Panna Lal Noor5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी को एक रंगीं दास्ताँ समझा था मैं
ज़िंदगी बार-ए-गराँ है ये कहाँ समझा था मैं

हाँ वही आँसू टपक कर कितना रुस्वा कर गए
जिन को अपना राज़दार-ए-बे-ज़बाँ समझा था मैं

उन का दामन थाम कर कितने दरख़्शाँ हो गए
मेरे वो आँसू कि जिन को राएगाँ समझा था मैं

अल्लाह अल्लाह उन के पाए नाज़ का हुस्न-ए-ख़िराम
रहगुज़र थी उन की जिस को कहकशाँ समझा था मैं

तह-ब-तह ज़ुल्म-ओ-सितम की इक रिदा-ए-नील-गूँ
खींच दी सर पर जिसे हफ़्त आसमाँ समझा था मैं