उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gulon ne muskurane ki saza pai to kya hoga

गुलों ने मुस्कुराने की सज़ा पाई तो क्या होगा

گلوں نے مسکرانے کی سزا پائی تو کیا ہوگا

शायर: Panna Lal Noor8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुलों ने मुस्कुराने की सज़ा पाई तो क्या होगा
सज़ा-ए-गुल पे ग़ुंचों को हँसी आई तो क्या होगा

कहीं बेदाद-ए-गुलचीं से परेशाँ हो के ग़ुंचों ने
गुलिस्ताँ में न खिलने की क़सम खाई तो क्या होगा

ये मेरे अश्क मेरे राज़-दाँ हैं मुझ से कहते हैं
अगर हो भी गई बिल-फ़र्ज़ रुस्वाई तो क्या होगा

ये ना-मुम्किन नहीं मिल जाएँ दो इक जाम माँगे से
मगर ये तिश्नगी फिर भी न मिट पाई तो क्या होगा

मिरी जानिब से राज़ इफ़्शा न होगा है यक़ीं मुझ को
सर-ए-महफ़िल वो चश्म-ए-नाज़ शर्माई तो क्या होगा

अभी तो अज़्म-ए-तर्क-ए-बादा-नोशी है ख़ुदा जाने
कभी तौबा मिरी शीशे से टकराई तो क्या होगा

दुआ थी आएँ वो या फिर क़ज़ा आए वो कहते हैं
कहीं अब उन से पहले ही क़ज़ा आई तो क्या होगा

अभी तो है शिकायत 'नूर' को उन के तग़ाफ़ुल से
मगर ख़ुद उस के जज़्बों में कमी आई तो क्या होगा