उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chhupi hui kahin sajdon mein sar-kashi to nahin

छुपी हुई कहीं सज्दों में सर-कशी तो नहीं

چھپی ہوئی کہیں سجدوں میں سرکشی تو نہیں

शायर: Panna Lal Noor11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

छुपी हुई कहीं सज्दों में सर-कशी तो नहीं
ये मेरी रस्म-ए-इबादत भी बंदगी तो नहीं

बग़ैर वज्ह ये साक़ी की बे-रुख़ी तो नहीं
मैं सोचता हूँ कहीं कुछ ख़ता हुई तो नहीं

मैं मुतमइन हूँ मगर सिर्फ़ ये बता दीजे
ये ग़म जो आप ने बख़्शा है आरज़ी तो नहीं

सभी के दिल में मोहब्बत की आग होती है
सभी को रास भी आए ये लाज़मी तो नहीं

अजल का चेहरा नज़र आए कुछ बंधे ढारस
रह-ए-हयात में इतनी भी रौशनी तो नहीं

तसव्वुरात में कुछ देर खो तो जाता हूँ
मगर अब इन में भी अगली सी दिलकशी तो नहीं

चमन वही है बहारें वही हैं गुल भी वही
मगर गुलों में वो ख़ुशबू वो ताज़गी तो नहीं

हर एक चीज़ नज़र आती है उदास उदास
कहीं ये मेरे ही एहसास की कमी तो नहीं

ये सारे रंज ब-क़ैद-ए-हयात ही तो नहीं
हयात मेरी कोई उम्र ख़िज़र की तो नहीं

किसी पे बरसे कोई बूँद बूँद को तरसे
ये और जो भी हो साक़ी की मुंसिफ़ी तो नहीं

कभी जो 'नूर' कोई रिश्ता-ए-वफ़ा टूटे
ये देख लेना कि आँखों में कुछ नमी तो नहीं