उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghazal kahi hai hadis-e-gham-e-jahan ki tarah

ग़ज़ल कही है हदीस-ए-ग़म-ए-जहाँ की तरह

غزل کہی ہے حدیث غم جہاں کی طرح

शायर: Panna Lal Noor9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़ज़ल कही है हदीस-ए-ग़म-ए-जहाँ की तरह
सुनेंगे लोग इसे अपनी दास्ताँ की तरह

फ़रेब देता हूँ दुनिया को इंकिसारी का
मैं अपने आप में फैला हूँ आसमाँ की तरह

क़दम क़दम पे ज़िया-बारियाँ म'आज़-अल्लाह
ये रहगुज़र है कि फैली है कहकशाँ की तरह

ये गुल तो गुल हैं चमन को न बेच दें ज़ालिम
जो रूप अपना बनाए हैं बाग़बाँ की तरह

ज़रूर साज़िश-ए-किल्क-ए-अज़ल थी कुछ इस में
पड़ा हूँ एक तरफ़ हर्फ़-ए-राएगाँ की तरह

कहाँ था मेरा नशेमन मैं सब से पूछ आया
किसी का घर न जले मेरे आशियाँ की तरह

टटोल लेना ज़रा उन की आस्तीनें भी
जो तुम से हाथ मिलाते हैं राज़-दाँ की तरह

वो जिन का राज़-ए-मोहब्बत था बे-नियाज़ हुए
हम उन का राज़ छुपाए हैं अपनी जाँ की तरह

कोई तो जान पे खेले है बन के परवाना
जला करे है कोई शम्अ-ए-बे-ज़बाँ की तरह