उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajib shaKHs tha mansur sochta hun main

अजीब शख़्स था मंसूर सोचता हूँ मैं

عجیب شخص تھا منصور سوچتا ہوں میں

शायर: Panna Lal Noor4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजीब शख़्स था मंसूर सोचता हूँ मैं
कि दे के सर भी पुकारा किया ख़ुदा हूँ मैं

न सैर-गाह न मेरी क़याम-गाह यहाँ
भटक के हद्द-ए-तअ'य्युन में आ गया हूँ मैं

ख़िरद की सारी हदें पार हो गईं फिर भी
किसी पे ये न खुला आज तक कि क्या हूँ मैं

सुना है जब से हर इक शय में तेरा जल्वा है
बड़े ग़ुरूर से आईना देखता हूँ मैं