उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi chhoD teri had se main bahar niklun

ज़िंदगी छोड़ तिरी हद से मैं बाहर निकलूँ

زندگی چھوڑ تری حد سے میں باہر نکلوں

शायर: Taj Muhammad Siddiqui5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी छोड़ तिरी हद से मैं बाहर निकलूँ
यूँ तो तन्हा हूँ मगर बन के मैं लश्कर निकलूँ

प्यास लोगों की बुझाऊँ मैं यही काफ़ी है
मैं ने चाहा ही नहीं बन के समंदर निकलूँ

ज़ेर कर दूँ मैं किसी को ये तमन्ना ही नहीं
है यही ख़ूब कि ख़ुद ही से मैं बेहतर निकलूँ

वक़्त पड़ जाए तो सरहद की हिफ़ाज़त के लिए
हो न ताक़त भले चलने की मुझे पर निकलूँ

'ताज' हक़ बात की दुनिया में गवाही के लिए
'ऐश-ओ-'इशरत को मियाँ मार के ठोकर निकलूँ