उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi aur ghar ka naqsha ek jaisa ho raha hai

ज़िंदगी और घर का नक़्शा एक जैसा हो रहा है

زندگی اور گھر کا نقشہ ایک جیسا ہو رہا ہے

शायर: Ehsanul Haq Mazhar4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी और घर का नक़्शा एक जैसा हो रहा है
कमरे बढ़ते जा रहे हैं सहन छोटा हो रहा है

ग़म ने हम को आ लिया तो इतनी हैरत क्यों है दिल को
मैं ने पहले कह दिया था अपना पीछा हो रहा है

लोग मरते जा रहे हैं दो तरफ़ से और अफ़्सोस
ज़िंदगी के नाम पर ये सारा झगड़ा हो रहा है

इश्क़ ऐसा मुख़्तलिफ़ भी तज्रबा 'मज़हर' नहीं है
ख़्वाब देखे जा रहे हैं काम-धंदा हो रहा है