उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHumar-e-qurb mein is baat ka KHayal na tha

ख़ुमार-ए-क़ुर्ब में इस बात का ख़याल न था

خمار قرب میں اس بات کا خیال نہ تھا

शायर: Ehsanul Haq Mazhar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुमार-ए-क़ुर्ब में इस बात का ख़याल न था
हमारे ज़ेहन में कुछ और था विसाल न था

तिरी जुदाई में महताब देखते हम क्या
हमारा मसअला तू था तिरा जमाल न था

फिर एक दिन उसे सब लोग देखने पहुँचे
पलट के आए तो लब पर कोई सवाल न था

कमाल ये है तिरे हिज्र में सलामत हूँ
तिरे फ़िराक़ में मरना कोई कमाल न था

ग़मों के वहम में गुज़री है ज़िंदगी सारी
मलाल करते रहे गो कोई मलाल न था

जो तेरा हाल है इस से तो साफ़ लगता है
हमारे बाद किसी को तिरा ख़याल न था