उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zinda rahne ki KHatir bebak hua

ज़िंदा रहने की ख़ातिर बेबाक हुआ

زندہ رہنے کی خاطر بے باک ہوا

शायर: Qamar Siddiqui8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदा रहने की ख़ातिर बेबाक हुआ
हम ने समझा छोड़ो क़िस्सा पाक हुआ

माँ का कहना कब माना था बचपन में
मुझ को इस का अब जा कर इदराक हुआ

वक़्त गुज़रते ये भी मुरझा जाएगा
गुलशन का हर फूल जो ख़ुश-पोशाक हुआ

मुर्दा है जो तैर रहा है दरिया में
जो डूबा बस वही यहाँ तैराक हुआ

हम नादाँ थे बोल बोल कर हार गए
बच्चा ख़ुश था चुप रह कर चालाक हुआ

सच्चाई से आँख मिलाना मुश्किल है
आओ देखो सारा मंज़र ख़ाक हुआ

गर्दिश करते रहना ही क़िस्मत में है
इंसाँ हो या फिर कुम्हार का चाक हुआ

आप 'क़मर' नाहक़ ही शिकवा करते हैं
जल्वा उस का जो जितना सफ़्फ़ाक हुआ