उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har ek samt hain wa nafraton ke darwaze

हर एक सम्त हैं वा नफ़रतों के दरवाज़े

ہر ایک سمت ہیں وا نفرتوں کے دروازے

शायर: Qamar Siddiqui8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर एक सम्त हैं वा नफ़रतों के दरवाज़े
सजाए बैठे हैं फिर भी दिलों के दरवाज़े

समझ के दुश्मन-ए-जाँ ही इधर चले आना
कभी जो बंद मिलें दोस्तों के दरवाज़े

अभी तो सर हैं सलामत हमारे शानों पर
अभी से छोड़ दें क्यों मक़्तलों के दरवाज़े

हमारे ख़्वाबों में सोने के हैं महल यारो
लगाएँ इन में कहाँ लकड़ियों के दरवाज़े

जिसे समझते थे 'इज़्ज़त का पासबाँ हम लोग
उखाड़ फेंके उसी ने घरों के दरवाज़े

अगर न लफ़्ज़-ए-मोहब्बत से आश्ना होंगे
खुले रहेंगे यूँही हादसों के दरवाज़े

न हाल पूछा ख़बर ली न जिन का ग़म बाँटा
खड़े हो फिर भी उन्हीं भाइयों के दरवाज़े

'क़मर' ये शहर नहीं हक़-परस्त लोगों का
लगी है भीड़ यहाँ काज़िबों के दरवाज़े