उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis ne sar-e-mizhgan koi gauhar nahin dekha

जिस ने सर-ए-मिज़्गाँ कोई गौहर नहीं देखा

جس نے سر مژگاں کوئی گوہر نہیں دیکھا

शायर: Qamar Siddiqui6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस ने सर-ए-मिज़्गाँ कोई गौहर नहीं देखा
उस ने उफ़ुक़-ए-सुब्ह का मंज़र नहीं देखा

हर एक ने दीवाना उसे कह तो दिया है
क्या बोझ लिए फिरता है दिल पर नहीं देखा

कैसे कहूँ इस दौर-ए-पुर-आशोब की हालत
दहशत का वो 'आलम था कि बाहर नहीं देखा

क्या इस लिए हो जाएँ करम से तिरे मुनकिर
कि हम ने अबाबीलों का लश्कर नहीं देखा

बैठा है किए अपने मुक़द्दर पे भरोसा
कोताह-नज़र है कभी बाहर नहीं देखा

उस क़ौम को जीने का 'क़मर' हक़ नहीं जिस ने
ख़ुद अपने ही आ'माल का जौहर नहीं देखा