उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zillat hai jo phailae bashar pesh-e-digar hath

ज़िल्लत है जो फैलाए बशर पेश-ए-दिगर हाथ

ذلت ہے جو پھیلائے بشر پیش دگر ہاتھ

शायर: Pandit Daya Shankar Naseem Lakhnawi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िल्लत है जो फैलाए बशर पेश-ए-दिगर हाथ
यारब न कभी हाथ का हो दस्त-निगर हाथ

पंजा करें ख़ुर्शीद से बेदारों की पलकें
फ़ुर्क़त की शब आ जाए जो दामान-ए-सहर हाथ

हैं साहब-ए-सर-पंजा रईसों को नचाते
सर पर जो पड़े चोट तो होता है सिपर हाथ

जी में है कहूँ उन से कि हूँ दस्त-गिरफ़्ता
वो सुन के ख़जिल हों जो कहें लाओ इधर हाथ

क्या दुज़्द-ए-हिना हाथ लगा सीम-बरों को
दिल हाथ से ले जाता है चोरी से वो हर हाथ

ख़ुर्शीद के पंजे से इशारा है कि आक़िल
अल्लाह की जानिब को उठा वक़्त-ए-सहर हाथ