उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bal paDne laga abru-e-KHamdar ke upar

बल पड़ने लगा अबरू-ए-ख़मदार के ऊपर

بل پڑنے لگا ابروئے خم دار کے اوپر

शायर: Pandit Daya Shankar Naseem Lakhnawi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बल पड़ने लगा अबरू-ए-ख़मदार के ऊपर
आ जाए न आफ़त कहीं दो-चार के ऊपर

क़तरात-ए-अरक़ हैं नहीं ये सिल्क-ए-गुहर हैं
क्या अक्स-फ़गन उस रुख़-ए-गुलनार के ऊपर

ख़ूँ-रेज़ी पे बाँधेगा कमर जब कि वो सफ़्फ़ाक
गुलज़ार बना देगा तन-ए-ज़ार के ऊपर

बोसा जो तलब मैं ने किया बोले ये अग़्यार
तलवार चलेगी इसी तकरार के ऊपर

वा'दा किया आने का पर आए नहीं हरगिज़
क्या होए यक़ीन आप के इक़रार के ऊपर

ख़ूबों को मोहब्बत है बुरों से भी कि जूँ गुल
रहता है सदा साया-फ़गन ख़ार के ऊपर

तासीर है तक़रीर में उस शोख़ की इतनी
ख़ामोश हुईं बुलबुलें गुफ़्तार के ऊपर