उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaKHm jab guftugu nahin karta

ज़ख़्म जब गुफ़्तुगू नहीं करता

زخم جب گفتگو نہیں کرتا

शायर: Iftikhar Shahid Abu Saad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ख़्म जब गुफ़्तुगू नहीं करता
चारागर भी रफ़ू नहीं करता

शहर-ए-उल्फ़त का वो मुनाफ़िक़ है
बात जो रू-ब-रू नहीं करता

बात-बे-बात मुस्कुराता हूँ
ग़म को मैं सुर्ख़-रू नहीं करता

हूक अंदर से उठ रही है मियाँ
मैं दिखाने को हू नहीं करता

ज़ब्त की आख़िरी निशानी है
मैं अगर हाओ-हू नहीं करता

ठीक है देख-भाल करता है
ज़ख़्म लेकिन रफ़ू नहीं करता

अपने ताईं वो ख़ूब लिखता है
लफ़्ज़ की आबरू नहीं करता

ऐ मिरे पारसा बता मुझ को
मैं जो करता हूँ तू नहीं करता

जो उदासी का पेड़ है 'शाहिद'
सब्ज़-रुत में नुमू नहीं करता