उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sham hote hi charaghon ko jalane wale

शाम होते ही चराग़ों को जलाने वाले

شام ہوتے ہی چراغوں کو جلانے والے

शायर: Iftikhar Shahid Abu Saad8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शाम होते ही चराग़ों को जलाने वाले
लौट के आते नहीं छोड़ के जाने वाले

तू मिरी आँख को भाया है मिरे दिल को नहीं
तेरे अतवार तो लगते हैं ज़माने वाले

'उम्र भर तुझ को मिरा ख़्वाब नहीं आएगा
वस्ल की शाम मिरा हिज्र मनाने वाले

या'नी कुछ रोज़ तुझे छोड़ के मैं भी ख़ुश था
मुझ को ये बात बताते हैं बताने वाले

ज़िंदगी आज तुझे छोड़ दिया है हम ने
हम नहीं आज तिरे नाज़ उठाने वाले

तू ने देखी मिरे हाथों की महारत लेकिन
वो मिरे पाँव मिरा चाक घुमाने वाले

शौक़-ए-नज़्ज़ारा लिए आँख किधर जाएगी
हुस्न वाले हैं तिरे शहर से जाने वाले

ये भी मुमकिन है हवा कोई तमाशा कर दे
हम तिरे नाम की शमएँ हैं जलाने वाले