उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sada-e-shauq sukut-e-labi se sharminda

सदा-ए-शौक़ सुकूत-ए-लबी से शर्मिंदा

صدائے شوق سکوت لبی سے شرمندہ

शायर: Iftikhar Shahid Abu Saad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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सदा-ए-शौक़ सुकूत-ए-लबी से शर्मिंदा
दरूँ का शोर मिरी ख़ामुशी से शर्मिंदा

कहो तो आज ज़रा सा सँवार लूँ ख़ुद को
कि आइने हैं मिरी सादगी से शर्मिंदा

अजीब दोहरी 'इज़्ज़त का सामना है इन्हें
कोई किसी से तो कोई किसी से शर्मिंदा

हमारे हाथ जो दस्तक न दे सके दर पर
हमारे हाथ रहे उस कजी से शर्मिंदा

हम अपनी ख़ाक जहाँ में उड़ाए फिरते हैं
ऐ शहर-ए-यार तुम्हारी गली से शर्मिंदा

हम इस सदी में भी मंज़िल से आश्ना न हुए
ये और बात है पिछली सदी से शर्मिंदा

है मेरे पास ये लुक्नत-ज़दा ज़बाँ 'शाहिद'
ऐ ख़ुश-कलाम तिरी नग़्मगी से शर्मिंदा