उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaban par aarzu ki baat lana saKHt mushkil hai

ज़बाँ पर आरज़ू की बात लाना सख़्त मुश्किल है

زباں پر آرزو کی بات لانا سخت مشکل ہے

शायर: Badr Jamali7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़बाँ पर आरज़ू की बात लाना सख़्त मुश्किल है
मगर राज़-ए-मोहब्बत का छुपाना सख़्त मुश्किल है

यही आईन-ए-उल्फ़त है यही ज़ौक़-ए-वफ़ा-कोशी
अगरचे ज़ख़्म खा कर मुस्कुराना सख़्त मुश्किल है

उसी मंज़िल की जानिब बढ़ रहा है हर क़दम अपना
जिधर इक इक क़दम आगे बढ़ाना सख़्त मुश्किल है

हमें ले जा रहा है इज़्तिराब-ए-शौक़ उस दर पर
जहाँ सुनते हैं क़िस्मत आज़माना सख़्त मुश्किल है

जलाएँगे चराग़-ए-आरज़ू तारीकी-ए-ग़म में
ये कुछ आसाँ नहीं है हम ने माना सख़्त मुश्किल है

तिरे हर नारवा जौर-ओ-सितम को भूल सकता हूँ
तिरी शान-ए-करम को भूल जाना सख़्त मुश्किल है

‘उमूमन मुस्कुराता हूँ 'जमाली' झूम जाता हूँ
कि जिस 'आलम में अक्सर मुस्कुराना सख़्त मुश्किल है