उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haq kaha dar pe jis ne wo bashar kaisa tha

हक़ कहा दार पे जिस ने वो बशर कैसा था

حق کہا دار پہ جس نے وہ بشر کیسا تھا

शायर: Badr Jamali8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हक़ कहा दार पे जिस ने वो बशर कैसा था
सच बताओ मुझे वो अहल-ए-नज़र कैसा था

शहर-ए-आशोब लिखा जिस के लिए लोगों ने
कैसे बाशिंदे थे उस के वो नगर कैसा था

जल गया राख हुआ यूँ तो नशेमन उजड़ा
देखने वालो कहो रक़्स-ए-शरर कैसा था

शाख़ पर जितने परिंदे थे सभी चीख़ पड़े
टूटने वाला न-जाने वो शजर कैसा था

दास्तान-ए-ग़म-ओ-आलाम मिरी झूट सही
तेरे चेहरे पे वो ता-देर असर कैसा था

जब नज़र उस पे पड़ी और मिरा दिल धड़का
कौन था उस में ख़ुदा जाने वो घर कैसा था

क्या कोई हादसा-ए-मौत हुआ था वाक़े'
इक हुजूम आज सर-ए-राहगुज़र कैसा था

तुम ने देखा था 'जमाली' को सुनाओ लोगो
हाँ वो शा'इर न सही अहल-ए-नज़र कैसा था