उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zat ke gard fasilen hain riyazat malum

ज़ात के गर्द फ़सीलें हैं रियाज़त मा'लूम

ذات کے گرد فصیلیں ہیں ریاضت معلوم

शायर: Jafar Raza8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ात के गर्द फ़सीलें हैं रियाज़त मा'लूम
सिर्फ़ जन्नत के लिए है तो इबादत मा'लूम

ये भी इक शान-ए-रहीमी है तिरी इज़्ज़-ओ-जल
न तो मंज़िल की ख़बर है न मसाफ़त मा'लूम

वो भी इक शख़्स है सादा सा मगर पेचीदा
न खुली उस की मोहब्बत न अदावत मा'लूम

ज़ख़्म-ए-दिल हो गए ख़ंदाँ वो मुलाक़ात हुई
है मुझे आप का अंदाज़-ए-अयादत मा'लूम

वही क़ातिल वही मुंसिफ़ वही ऐनी शाहिद
अद्ल और आप की मीज़ान-ए-अदालत मा'लूम

जाँच का हुक्म हक़ाएक़ की है पर्दा-पोशी
उन को पहले से हैं अस्बाब-ए-बग़ावत मा'लूम

ऐसे-वैसे हुए इस शहर में कैसे कैसे
अहल-ए-दस्तार की है हम को नजाबत मा'लूम

ख़ून-ए-नाहक़ से हैं बुनियादें भरी महलों की
क़त्ल होते थे जो होती थी सियादत मा'लूम