उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chandni-raat mein sandal sa bikharta saya

चाँदनी-रात में संदल सा बिखरता साया

چاندنی رات میں صندل سا بکھرتا سایہ

शायर: Jafar Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाँदनी-रात में संदल सा बिखरता साया
एक आसेब की सूरत नज़र आया साया

सर पे सूरज है मगर हश्र का मैदान नहीं
जाने क्यूँ राह में क़दमों से है उलझा साया

फ़र्द की ज़ात में नादीदा नज़ारे की तरह
साए के साथ टहलता नज़र आया साया

ये भी वारफ़्तगी-ए-शौक़ में होता है गुमाँ
अभी आया है मिरे पास महकता साया

ये वही लोग हैं जो दिन में थे मेरे जैसे
शाम के वक़्त नज़र आते हैं साया साया

मुंजमिद रौशनी फूटी थी किसी चादर से
मैं ने कल अब्र से छनता हुआ देखा साया

कल तक इस साया-ए-दीवार में दम मिलता था
ज़िंदगी लगती है अब एक खंडर का साया