उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil jo murda ho to ye rashk-e-jinan kuchh bhi nahin

दिल जो मुर्दा हो तो ये रश्क-ए-जिनाँ कुछ भी नहीं

دل جو مردہ ہو تو یہ رشک جناں کچھ بھی نہیں

शायर: Jafar Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल जो मुर्दा हो तो ये रश्क-ए-जिनाँ कुछ भी नहीं
लाला हो सब्ज़ा हो या आब-ए-रवाँ कुछ भी नहीं

ये दहकते हुए ग़ुंचे ये सुलगते हुए दिल
हर तरफ़ सोज़-ए-दरूँ हर्फ़-ए-ज़बाँ कुछ भी नहीं

प्यारे दामन से जुदा हो गए मैं ने देखा
हसरतें बोलीं मियाँ उम्र-ए-रवाँ कुछ भी नहीं

लफ़्ज़-ओ-मा'नी में जो रिश्ता है वो बुनियादी है
सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का इक सैल-ए-रवाँ कुछ भी नहीं

कर्दा-ना-कर्दा गुनाहों में कटी उम्र-ए-अज़ीज़
लोग कहते हैं ज़ियाँ वर्ना ज़ियाँ कुछ भी नहीं

बारिश-ए-संग हो शीशे की कमीं-गाहों से
कैसे फ़रज़ाने हो शीशे का मकाँ कुछ भी नहीं

ख़्वाब से ख़्वाब में इक उम्र गिरफ़्तार रहा
अब खला ख़्वाब ब-जुज़ वहम-ओ-गुमाँ कुछ भी नहीं