उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aatish-e-fikr badan ghulta ho paiham jaise

आतिश-ए-फ़िक्र बदन घुलता हो पैहम जैसे

آتش فکر بدن گھلتا ہو پیہم جیسے

शायर: Jafar Raza9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आतिश-ए-फ़िक्र बदन घुलता हो पैहम जैसे
किसी नागिन ने कहीं चाटी हो शबनम जैसे

बस इसी मोड़ से कुछ आगे है मंज़िल अपनी
हादसे मौत निशान-ए-रह-ए-पुर-ख़म जैसे

बर्फ़-आलूदा गुलों पर ये चमकती किरनें
उन की हँसती हुई आँखें हुईं पुर-नम जैसे

मौसम-ए-गुल में ये पत्तों के खड़कने की सदा
नफ़स-ए-उम्र की आवाज़ हो मद्धम जैसे

ज़ख़्म-ए-दिल रोज़ कुरेदो तो हो लज़्ज़त अफ़्ज़ूँ
इक मुदावा है ग़म-ए-यार हो मरहम जैसे

ओस में डूबे शगूफ़ों की उदासी का धुआँ
किसी बीमार की आँखें हुईं पुर-नम जैसे

आँखों आँखों में कोई बात हुई फूलों में
अपने गुलशन की फ़ज़ा हो गई बरहम जैसे

हुस्न ही हुस्न है कश्मीर के बुत-ख़ाने में
दूधिया चाँदनी फैली हुई पूनम जैसे

ख़ूब 'जाफ़र'-रज़ा अहबाब तुम्हारे हैं ये
जो हवाओं से बदल जाते हैं मौसम जैसे