उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zahir ko aaj Talta hun

ज़ाहिर को आज टालता हूँ

ظاہر کو آج ٹالتا ہوں

शायर: Parwez Rahmani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ाहिर को आज टालता हूँ
बातिन तिरा खँगालता हूँ

ऐ आसमान सुरख़-रू हो
अपना लहू उछालता हूँ

आईना-दार तू ही बन जा
मैं ख़ुद पे ख़ाक डालता हूँ

आ देख ज़िंदगी कि कैसे
साए में जिस्म ढालता हूँ

होता है सर्द जब अंधेरा
सूरज तिरा निकालता हूँ

तू अपने आस्तीं से नालाँ
इक मैं कि ख़ुद को पालता हूँ

'परवेज़' कौन है कि जिस से
मैं बोलता हूँ चालता हूँ