उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yunhi gar har sans mein thoDi kami ho jaegi

यूँही गर हर साँस में थोड़ी कमी हो जाएगी

یوں ہی گر ہر سانس میں تھوڑی کمی ہو جائے گی

शायर: Jagat Mohan Lal Ravan10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यूँही गर हर साँस में थोड़ी कमी हो जाएगी
ख़त्म रफ़्ता रफ़्ता इक दिन ज़िंदगी हो जाएगी

देखने वाले फ़क़त तस्वीर-ए-ज़ाहिर पर न जा
हर नफ़स के साथ दुनिया दूसरी हो जाएगी

गर यही फ़स्ल-ए-जुनूँ-ज़ा है यही अब्र-ए-बहार
अज़्मत-ए-तौबा निसार-ए-मय-कशी हो जाएगी

मर्ग-ए-बे-हंगाम कहते हैं जिसे आज अहल-ए-दर्द
कल यही सूरत बदल कर ज़िंदगी हो जाएगी

ज़िक्र है ज़िंदाँ में वो गुलज़ार पर बिजली गिरी
आज मेरे आशियाँ में रौशनी हो जाएगी

सज्दा गाह-ए-आम पर सज्दे से कुछ हासिल नहीं
मुफ़्त आलूदा जबीन-ए-बंदगी हो जाएगी

ख़त्म है शब चेहरा-ए-मशरिक़ से उठती है नक़ाब
दम-ज़दन में रौशनी ही रौशनी हो जाएगी

मुत्तसिल हैं ज़ोफ़ ओ क़ुव्वत की हदें हाँ होश्यार
वर्ना इस तर्क-ए-ख़ुदी में ख़ुद-कुशी हो जाएगी

ज़ख़्म भी ताज़ा है और दिल भी नहीं मानूस-ए-दर्द
रफ़्ता रफ़्ता यूँही आदत सब्र की हो जाएगी

शम्अ सा जब शाम ही से है गुदाज़-ए-दिल 'रवाँ'
सुब्ह तक क्या जाने क्या हालत तिरी हो जाएगी