उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gul-e-virana hun koi nahin hai qadr-dan mera

गुल-ए-वीराना हूँ कोई नहीं है क़द्र-दाँ मेरा

گل ویرانہ ہوں کوئی نہیں ہے قدرداں میرا

शायर: Jagat Mohan Lal Ravan13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुल-ए-वीराना हूँ कोई नहीं है क़द्र-दाँ मेरा
तू ही देख ऐ मिरे ख़ल्लाक़ हुस्न-ए-राएगाँ मेरा

ये कह कर रूह निकली है तन-ए-आशिक़ से फ़ुर्क़त में
मुझे 'उजलत है बढ़ जाए न आगे कारवाँ मेरा

हवा उस को उड़ा ले जाए अब या फूँक दे बिजली
हिफ़ाज़त कर नहीं सकता मिरी जब आशियाँ मेरा

ज़मीं पर बार हूँ और आसमान से दूर ऐ मालिक
नहीं मा'लूम कुछ आख़िर ठिकाना है कहाँ मेरा

मुझे नग़्मे का लुत्फ़ आता है रातों की ख़मोशी में
दिल-ए-बिशकिस्ता है इक साज़-ए-आहंग फ़ुग़ाँ मेरा

वहीं से इब्तिदा-ए-कूचा-ए-दिलदार की हद है
क़दम ख़ुद चलते चलते आ के रुक जाए जहाँ मेरा

ज़रा दूर और है ऐ कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ साहिल
कि इस बहर-ए-जहाँ में हर नफ़स है बादबाँ मेरा

हुई जाती है तन्हाई में लज़्ज़त रूह की ज़ाए'
लुटा जाता है वीराने में गंज-ए-शाएगाँ मेरा

'अनासिर हँसते हैं दुनिया की वुस'अत मुस्कुराती है
किसी से पूछते हैं अहल-ए-बीनश जब निशाँ मेरा

मिरे बा'द और फिर कोई नज़र मुझ सा नहीं आता
बहुत दिन तक रक्खेंगे सोग अहल-ए-ख़ानदाँ मेरा

ग़नीमत है नफ़स दो चार जो बाक़ी हैं अब वर्ना
कभी का लुट चुका सरमाया-ए-सोद-ओ-ज़ियाँ मेरा

अभी तक फ़स्ल-ए-गुल में इक सदा-ए-दर्द आती है
वहाँ की ख़ाक से पहले जहाँ था आशियाँ मेरा

'रवाँ' सच है मोहब्बत का असर ज़ाए' नहीं होता
वो रो देते हैं अब भी ज़िक्र आता है जहाँ मेरा