उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yun sang-e-intizar se kab tak bandhe rahen

यूँ संग-ए-इंतिज़ार से कब तक बंधे रहें

یوں سنگ انتظار سے کب تک بندھے رہیں

शायर: Naeem Gilani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यूँ संग-ए-इंतिज़ार से कब तक बंधे रहें
दीवार-ए-ना-रसाई ही क्यूँ देखते रहें

गुज़रे न कोई ज़ूद-फ़रामोश उम्र-भर
और बे-सबब गली के दरीचे खुले रहें

तुम से गिला-गुज़ार है अपनी ये बे-घरी
कब तक तुम्हारे ख़्वाब से बाहर पड़े रहें

हालत वही है आज भी हम संग-ओ-ख़िश्त की
रख दे कोई जहाँ पे वहीं पर धरे रहें

यूँही खड़े रहें किसी मंज़िल की आस में
गर्द-ए-मलाल-ए-हिज्र से रस्ते अटे रहें

पूछे मिरे मसीहा-नफ़स से कोई 'नईम'
ताक़-ए-बदन में ज़ख़्म कहाँ तक जले रहें